नई दिल्ली। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान तथा प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष विभाग के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेन्द्र सिंह ने शुक्रवार को कहा कि वैज्ञानिक खदान बंदी भारत की सर्कुलर इकोनॉमी की दिशा में परिवर्तन की एक महत्वपूर्ण पहल है। उन्होंने कहा कि भारत संसाधन समाप्त हो चुकी खदानों को संपदा सृजन, पर्यावरण संरक्षण और स्थायी आजीविका के नए केंद्रों में बदलकर खदान बंदी की अवधारणा को नया स्वरूप दे रहा है।
नई दिल्ली में कोयला मंत्रालय द्वारा आयोजित ‘आरोह-खदान बंदी पर वार्षिक रिपोर्ट’ जारी करने के कार्यक्रम में डॉ. जितेन्द्र सिंह ने कहा कि बंद हो चुकी खदान को अब आर्थिक गतिविधियों के अंत के रूप में नहीं, बल्कि लोगों और पर्यावरण दोनों के हित में विकास की नई शुरुआत के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नवाचार आधारित शासन दृष्टिकोण का उदाहरण बताया।
डॉ. जितेन्द्र सिंह ने कहा कि वैज्ञानिक खदान बंदी एक साथ कई राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाती है, जिनमें कचरे से संपदा सृजन, संसाधन दक्षता, पर्यावरण संरक्षण, सतत भूमि उपयोग और सामुदायिक विकास शामिल हैं। उन्होंने कहा, “आपने एक कोयला खदान को बंद किया है और संपदा की दूसरी खदान खोल दी है।”
उन्होंने कहा कि यह पहल वर्ष 2070 तक नेट-जीरो लक्ष्य हासिल करने की भारत की प्रतिबद्धता को भी मजबूत करती है। उनके अनुसार, आर्थिक विकास के साथ प्राकृतिक संसाधनों का जिम्मेदार उपयोग और पर्यावरण की बहाली सतत विकास के प्रमुख आधार हैं।
मंत्री ने ‘आरोह’ रिपोर्ट में शामिल वैज्ञानिक तरीके से बंद की गई 42 खदानों की सराहना करते हुए कहा कि ये परियोजनाएं खनन के बाद भूमि के उपयोग का व्यावहारिक मॉडल प्रस्तुत करती हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे क्षेत्रों को कृषि, नवीकरणीय ऊर्जा, पर्यटन, कौशल विकास और अन्य सामुदायिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है। उन्होंने महिला स्वयं सहायता समूहों की भागीदारी बढ़ाने पर भी जोर दिया।
डॉ. जितेन्द्र सिंह ने कोयला मंत्रालय और जर्मनी की जीआईजेड (GIZ) के बीच हुए कार्यान्वयन समझौते का स्वागत करते हुए कहा कि वैश्विक विशेषज्ञता और स्थानीय नवाचार का यह सहयोग वैज्ञानिक खदान बंदी और भूमि के पुनः उपयोग को गति देगा। उन्होंने कहा कि ऐसे साझेदारी मॉडल अन्य क्षेत्रों में भी अपनाए जा सकते हैं।
उन्होंने सुझाव दिया कि वैज्ञानिक रूप से पुनर्स्थापित प्रत्येक खदान पर लघु डिजिटल फिल्में तैयार की जाएं, ताकि आम लोग, नीति निर्माता और अन्य हितधारक इन बदलावों को समझ सकें। उन्होंने कहा कि इससे देशभर में नवाचार और जनभागीदारी को बढ़ावा मिलेगा।
डॉ. जितेन्द्र सिंह ने सड़क निर्माण में स्टील स्लैग के उपयोग और इस्तेमाल किए गए खाद्य तेल से जैव ईंधन बनाने जैसी पहलों का उल्लेख करते हुए कहा कि विज्ञान आधारित नवाचार कचरे को संपदा में बदलने की क्षमता रखता है। उन्होंने कहा कि यही सोच वैज्ञानिक खदान बंदी के केंद्र में है, जहां समाप्त हो चुकी परिसंपत्तियां भविष्य के सतत विकास का आधार बन रही हैं।
कोयला मंत्रालय वैज्ञानिक खदान बंदी के लिए एक व्यापक ढांचा लागू कर रहा है, जिसमें पारिस्थितिकी की बहाली, सामुदायिक विकास और खनन के बाद भूमि के दीर्घकालिक उपयोग पर विशेष जोर दिया गया है। ‘आरोह-खदान बंदी पर वार्षिक रिपोर्ट’ में 42 वैज्ञानिक रूप से बंद की गई खदानों के विस्तृत अध्ययन, पहले और बाद की स्थिति का दस्तावेजीकरण तथा भविष्य की परियोजनाओं के लिए सर्वोत्तम कार्यप्रणालियां शामिल की गई हैं।