रायपुर। कवर्धा ब्लॉक के गुढ़ा गांव में रहने वाले किसान टीकेन्द्र सिंहा ने 25 एकड़ जमीन पर पारंपरिक खेती छोड़कर पूरी तरह जैविक पद्धति अपना ली है। 2010 में पारंपरिक तरीके से खेती करने पर उन्हें प्रति एकड़ केवल 4-5 क्विंटल धान की पैदावार मिलती थी।
जीवामृत और हरी खाद के उपयोग से अब यही उत्पादन बढ़कर प्रति एकड़ 22 क्विंटल से अधिक हो गया है। टीकेन्द्र साल में दो फसलें लेते हैं, जिसमें पहले सीजन में धान और दूसरे में सब्जियां उगाई जाती हैं। जैविक तरीकों के इस्तेमाल से न केवल उपज बढ़ी है बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता में भी सुधार हुआ है।
मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए टीकेन्द्र किसी रासायनिक खाद पर निर्भर नहीं हैं। वे खुद जीवामृत तैयार करते हैं। इसके लिए वे 200 लीटर पानी में गुड़, बेसन और बरगद के पेड़ के नीचे की मिट्टी का उपयोग करते हैं। यह मिश्रण खेतों में डालने से मिट्टी में मौजूद सूक्ष्म जीवों की सक्रियता बढ़ जाती है, जो फसल की जड़ों तक जरूरी पोषण पहुंचाते हैं।
इसके अलावा टीकेन्द्र ने फसलों को रोगों से बचाने के लिए भी देशी फार्मूले अपनाए हैं। वे नीम, बेशरम और धतूरा जैसी कड़वी पत्तियों का अर्क निकालकर फसल पर छिड़कते हैं, जिससे कीटों का हमला रुक जाता है। फंगस नियंत्रण के लिए वे पुराने मट्ठे या मही के घोल का इस्तेमाल करते हैं। इन प्रयोगों से बाजार में मिलने वाले महंगे और जहरीले कीटनाशकों पर होने वाला खर्च अब शून्य हो गया है।